बुधवार, 2 दिसंबर 2015

जयपुर के 'एल वुड इंटरनेशनल स्कूल' में

पिछले दिनों जयपुर के 'एल वुड इंटरनेशनल स्कूल' में बुक-क्लब एवं योग कक्ष के उद्घाटन समारोह में जाने का अवसर मिला। मेरे साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण पत्र के संपादक तथा विज्ञान लेखक श्री तरुण जैन भी थे। उन्होंने बच्चों को विज्ञान संबंधी जानकारी दी। बच्चों के आग्रह पर मैंने भी बच्चों को कहानियां, कविताएं सुनाईं। इस अवसर पर बच्चों के लिए कहानी/कविता वाचन की प्रतियोगिता भी आयोजित की गई थी। बालगोपालों ने पूरे आत्मविश्वास से हमें अपनी रचनाएं सुनाईं। निश्चय ही बच्चों के इस आत्मविश्वास को बनाने के पीछे उनकी प्रिय अध्यापिकाओं का ही योगदान था, इसे महसूस किया।
स्कूल के प्रबंधक एवं विज्ञान के सुपरिचित लेखक श्री हरीश यादव, स्कूल की प्राचार्या बहुमुखी प्रतिभा की धनी श्रीमती अर्चना शर्मा के अलावा श्रीमती आशा नेगी, श्रीमती यामिनी निर्वाण तथा अन्य अध्यापिकाओं का स्नेहसिक्त भावनाओं से ओतप्रोत व्यवहार अविस्मरणीय रहा। बच्चों के प्रति इन अध्यापिकाओं के मन में सहज ममता के भाव देखकर बहुत अच्छा लगा। इस अवसर पर पत्रिका प्रकाशन की ओर से श्री विनोद सिंह ने पुस्तक प्रदर्शनी भी लगाई। विद्यालय प्रशासन की ओर से भेजे गए इस अवसर के कुछ चित्र-










मंगलवार, 1 दिसंबर 2015

आकांक्षा सक्सेना की दो कविताएं

 

आकांक्षा सक्सेना की दो कविताएं

 





1. गुमनाम आशियाना




















2. जिस्म की आवाज़
 


 









शुक्रवार, 13 नवंबर 2015

पुस्तक-परिचय इक कली थी (काव्य-संग्रह)

कवयित्री: कंचन पाठक
प्रकाशक: हिन्द-युग्म 1, जिया सराय, हौज खास, नई दिल्ली-110016
संस्करण: प्रथम 2015 सजिल्द
मूल्य: 150/ रुपए $8
पृष्ठ: 120

 
                   वीणा के तारों की संगत को मचलती कविताएं
दिव्य भावनाओं की सुगंध से ओतप्रोत बहती बयार है, कंचन पाठक का काव्य-संग्रह 'इक कली थी'। प्रस्तुत संग्रह में कवयित्री की पचपन कविताएं हैं। ये कविताएं मन का बहुत स्नेह से स्पर्श करती हैं और फिर अपना बना लेती हैं। पढऩे वाला प्रसन्न हो जाता है। उसे प्रसन्नता इस बात की भी होती है कि उसके कीमती समय की यात्रा कुछ बेशकीमती कविताओं के साथ संपन्न हुई। लेकिन मन है कि मानता नहीं। मन अभी भरा नहीं..... काश! जल्दी ही इनकी कविताओं की अगली पुस्तक भी मिले। हो सकता है, कंचन जी तैयार कर रही हों, अगली पुस्तक। अथवा इन पंक्तियों को पढ़कर ही विचार कर लें.....मुझे नहीं मालूम, लेकिन ऐसी आशा, ऐसी शुभ अपेक्षा तो की ही जा सकती है।
कंचन पाठक को दर्द होता है, मानवीय संवेदनाओं के विकृत रूप से। कंचन पाठक को खुशी मिलती है, प्रकृति की अनुपम कारीगरी और सुरों के अनूठे सौंदर्य से। कंचन पाठक को ही क्यों होता है दर्द? कंचन पाठक को ही क्यों मिलती है खुशी? जबकि मानवीय संवेदनाएं तो लगभग सभी में होती हैं। लेकिन मुझे लगता है कि यह तो महसूस करने की कला है और जो इस कला में जितना पारंगत होता जाता है, उतना ही उसकी अनुभूतियों का भी विस्तार होता जाता है। कंचन पाठक को इसकी अनुभूति हुई है, ये कविताएं इस बात की गवाही देती हैं।
व्यक्ति के वर्तमान जीवन में चहुं ओर मानसिक उद्वेलन के नाना प्रकार दिखाई देते हैं। राग-लालच- ईर्ष्यालु भाव भी मन को शांति से नहीं रहने देते। जीवन के हर क्षेत्र में तनाव व्याप्त है। क्योंकि तनाव देने वाले विविध आयाम जीवन के हर क्षेत्र में विद्यमान हैं। कई बार व्यक्ति स्वयं भी जाने-अनजाने अनेक तनावों के ताने-बाने बुन लेता है, कि उनमें स्वयं उलझ कर रह जाता है। ऐसे में उसके मन की वीणा के तार प्राय: मौन ही रहते हैं। लेकिन जब कंचन पाठक की कविताएं हौले-हौले वीणा के तारों की संगत के लिए मचल उठती हैं तो मन में झंकार उत्पन्न होती ही है। यही नहीं, जब जगत् व्यापी कोलाहल गर्जन करने पर आमादा हो जाता है, तब कंचन पाठक की ये कविताएं अपनी प्रवाहमयी, लयात्मक भाषा-शैली के माध्यम से गुनगुनाते, पढ़ते हुए आंखों के बीहड़ से भावनाओं के स्नेहसिक्त सेतु से चलती हृदय-मार्ग से भीतर उतर आती हैं।
कंचन पाठक की कविताओं में धरती है, नदी है, नारी है, आकाश है। मंगलतिथि है, निराला बचपन है, प्रेम है, मां-वीणापाणि हैं और इस बात की भी प्रतीक्षा है कि सच्चा गणतंत्र भी आएगा।
अनेकानेक संदर्भों के माध्यम से बात कहने के बजाय, मैं यहां कवयित्री की दो कविताओं की कुछ पंक्तियां उद्धृत कर रहा हूं, आपके आस्वादन के लिए-
1.
एक प्रश्न है, हे रघुवर तुमसे
पूछते विषाद से फटती छाती
तज सिय जो छूते अहिल्या को
क्या तब भी अहिल्या तर पाती
हुआ छल से था वह शीलहरण
जिसे स्पर्श तुम्हारा तार गया
छल से ही मैथिली हरी गई
क्यूं यंत्रणा अविहित उजाड़ गया
संदेह विशृंखलित उन्मीलन
लज्जा से प्रणत भूमिजा ग्रीवा
यह प्रश्न अनुत्तरित सदियों से
पूछे नयना बहे सदा नीरा (अनुत्तरित प्रश्न)

2.
अंकुराई ललक कामना की
धड़कन में मंद सुरूर-सा है
फूले हैं हृदय में कनक-चंपा
अहसास नशे में चूर-सा है
कर प्राण-प्रतिष्ठित प्रेम मंत्र
दीपक अनुराग जला तो लूं
एक नील पुहुप सपनों वाला
नयनों में आज खिला तो लूं
कंपित है गात पुलकरस से
अधरों पर प्यास प्रखर छाई
बिखरे परिमल कुंतल कपोल
मधु-ऋतु अंगों में घुल आई
सुधि सुनयन के आलोडऩ की
अंतर-अभिलाष सजा तो लूं
एक नील पुहुप सपनों वाला
नयनों में आज खिला तो लूं (नील-पुहुप)
मैं सहमत हूं हमारे समय के एक अति महत्त्वपूर्ण प्रबुद्ध साहित्यकार आदरणीय पंडित सुरेश नीरव जी से-'कंचन पाठक ने तुलसी-क्षणों में अपनी ऋचा-दृष्टि के साथ शब्दों को अपनी छंदबद्ध कविताओं में उनकी स्वाभाविक लय के साथ इस करीने से रखा है कि वे अनहतनाद का सात्त्विक मंजुघोष बन गए हैं। ये कविताएं सामाजिक अनुषंगों से आबद्ध वे शब्द-चित्र हैं जो कंचन ने धूप के पृष्ठों पर छांव की तूलिका से उकेरे हैं।'
नारी मन के भीतर निरंतर उमड़ते-घुमड़ते प्यार, प्यास और संघर्ष के विविध रंगों को मुखरित करती हैं ये कविताएं। 'इक कली थी' पढऩे के बाद आप बहुत कुछ सोचने पर विवश हो जाएंगे। नई तरंग, नई ऊर्जा के स्पंदन भी महसूस करेंगे। संभव है, आप यह भी कह दें-'हे कंचन पाठक! अंत:करण में आपकी ही कविताओं की मोहक रोशनी है। हमने जैसे मोतियों से भरे थाल का स्पर्श किया हो। इसीलिए इन रचनाओं की इतनी आकर्षक शोभा है।' निस्संदेह कंचन पाठक के काव्य-माधुर्य को काव्य-प्रेमी हृदय अपनी स्मृति में सहज ही अंकित कर लेंगे।
कंचन पाठक के काव्य-सृजनतीर्थ के इन पचपन सोपानों पर उनकी काव्य-साधना को सघनता से साक्षी-भाव के साथ देखना, समझना, महसूस करना और रुक-रुक कर आगे बढऩा.....सचमुच एक दिव्य अनुभूति है। पढ़ेंगे तो स्वयं जानेंगे कि इस दैदीप्यमान हस्ताक्षर का हिन्दी के साहित्यिक आकाश में हृदय से स्वागत होना ही चाहिए।
-सुधीर सक्सेना 'सुधि'
75/44, क्षिप्रा पथ, मानसरोवर, जयपुर-302020
संपर्क: 09413418701
ई-मेल: sudhirsaxenasudhi@yahoo.com

मंगलवार, 15 जुलाई 2014


गीत
इन होठों पर नाम तुम्हारा


न होठों पर नाम तुम्हारा
दहकेगा ही इस सावन में।

कितने मौसम बीते तनहा
सूनी-सूनी राहें चलते।
इन नयनों ने देखे जाने
कितने दिन उगते-ढलते।
घर लौटूं तो मिल ही जाए
शायद ख़त  तेरा आंगन में।

तेरी यादों से सींचा है
मैंने अपनी मन-बगिया को।
छांव तले तुलसी चौरे की
रख दी धड़कन की डलिया को।
छिपने को आतुर हैं कितने
फूल तुम्हारे शुचि दामन में।

सच्ची लगन हृदय में हो तो
अभिलाषा होती है पूरी।
बरसों की तनहाई मिटती
कम होती जाती है दूरी।
ऐसा ही तो कुछ सीखा था
पीछे छूट चुके बचपन में।

आशा का पंछी स्पंदित
आता होगा आने वाला।
गीतों की पावन राहों में
रुनझुन राग सुनाने वाला।
मन-मूरत के आगे तब से
बैठ गया है मन पूजन में।
(चित्र-गूगल से साभार)
-सुधीर सक्सेना 'सुधि'

बुधवार, 7 मई 2014

कविता

फूल और कली.....
किसी ने बगीचे में बैठकर
एक प्रेम-गीत लिखा
तो एक फूल खिल गया।
एक कली को फूल का
साथ मिल गया।
अब खिलने को आतुर
कली खिलखिलाती है,
फूल हंसता-गाता है तो
किसी को क्यों
एतराज होता है
किसी का क्या जाता है?
-सुधीर सक्सेना 'सुधि'


बुधवार, 26 मार्च 2014


कविता
प्यारा-सा शब्द प्यार.....
मौसम चाहे कैसा भी हो
किसी भी देश का हो,
कोई फर्क नहीं पड़ता।
बस, अकेले होने पर ही सताते हैं
मौसम के विविध रंग।
लेकिन जब साथ होता है कोई
तो बांटते-बंटाते सुख-दु:ख.....
संग-साथ होने का एहसास दिलाते
हंसते-हंसाते बिता देते हैं मौसम के रंग।
दुश्मनी के अनेक रंग हो ही नहीं सकते
सिवाय एक सुर्ख रंग बहा देने के
लेकिन प्यार के तो विविध रंग होते हैं
और प्यार में डूबा सुर्ख रंग भी
बहुत प्यारा लगता है.....
प्यार तो चन्द्रमा है, पुष्प की सुगंध है,
बहता नीर है, समीरण है,
उमड़ता-घुमड़ता बादल है,
तारों की झिलमिलाहट है.....
दोस्ती के नाम पर दुश्मनी का
खलनायकी संदेश फैलाने वाले
हरकारो!
जब कभी तुम भी
अलग-थलग पड़कर
थकावट महसूस करो
यदि तुम्हें भी
प्यार करने वालों की तरह
एक होकर जीने की
अभिलाषा होने लगे,
मौसमों के सुख-दु:ख
बांटने-बंटाने की चाह
सताने लगे, तो
सबसे पहले मन की
खिड़की खोलकर रखना।
प्यार भरी दस्तक देती
सूर्य की पंछी-रश्मियां
उन रंगों से सराबोर कर देंगी
जिन रंगों को तुमने इंद्रधनुष में ही
देखा होगा।
फिर तुम
प्यार करने वालों से,
प्यार करने का सलीका सीखना।
और तुम पाओगे कि अरे,
प्यार में डूबा सुर्ख रंग भी
बहुत प्यारा लगता है.....
प्यारा-सा शब्द प्यार.....!!

-सुधीर सक्सेना 'सुधि'


















शनिवार, 22 मार्च 2014

गीत.....
गा रे ओ मौसम बनजारे
 
  






  


झूम रही फागुनी हवाएं
गा रे ओ मौसम बनजारे।

नयनों के हैं स्वप्न सिंदूरी
छूकर प्रीत निहाल हो गई।
दिल की रीती सूनी झोली
फिर से मालामाल हो गई।
पाँव नहीं थमते धरती पर
पिया-पिया अब हिया पुकारे।

सोंधीली माटी मधुमासित
मन के टोहे अर्थ बताए।
मुग्धा दूब निहारे पथ को
गीत फागुनी उसे रिझाए।
राज़ पलक के होठ छू रहे
होती बातें सांझ-सकारे।

फूलों की आशिक है बुलबुल
कहती तुम मेरे हो मेरे।
बहुत हो चुकी आंख-मिचौली
कभी अंधेरे, कभी उजेरे।
आसमान पंखों में सिमटा
धड़कन सुनते चांद-सितारे।

तन-प्राणों में विश्वासों का
इन्द्रधनुष सीखा मुसकाना।
मन के मीत, पंथ के साथी
देखो मुझको भूल न जाना
शगुन रस्म को चले निभाते
दो आंसू ये प्यारे-प्यारे।
गा रे ओ मौसम बनजारे।

-सुधीर सक्सेना 'सुधि'