मंगल सक्सेना का गीत
गंधों के देवता !
फिर मुझे सँवार लो !!
संकरी सुविधाओं से
फिर मुझे बुहार लो !!
गली-गली, चौराहे, नीमों पर झूल रहे
ओ मेरे संबंधी ! मुझको ही भूल रहे
आवारा सज्जनता !
मुझे भी उबार लो !!
जीने से ऊब गया
अंगना उतार लो !
गंधों के देवता !
तुम तो सर्वांग मधुर वास बने रहते हो
देते हो तृप्ति और प्यास बने रहते हो
सुखदायी आकुलता !
अब मुझे पुकार लो
तन-मन तो टूट रहा
प्राण भी उधार लो !
गंधों के देवता!
फिर मुझे सँवार लो !!